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कोवैक्सीन के ट्रायल में शामिल वालंटियर की मौत पर भारत बायोटेक ने दिया जवाब, कहा- मौत का कारण वैक्सीन नहीं

हैदराबाद। कोवैक्सीन का विवादों से पीछा नहीं छूट रहा है। भोपाल में कोवैक्सीन के ट्रायल में शामिल एक 47 साल के वालंटियर की संदिग्ध मौत पर भारत बायोटेक (Bharat Biotech) कंपनी ने सफाई दी है। वालंटियर दीपक मरावी 12 दिसंबर को कोवैक्सीन के ट्रायल में शामिल हुआ था। वैक्सीन का डोज लेने के 9वें दिन बाद यानी 21 दिसंबर को उनकी संदिग्ध मौत हो गई थी।

22 दिसंबर को शव का पोस्टमार्टम हुआ, तो उसके शरीर में जहर मिलने की पुष्टि हुई है। ये खबर मीडिया में आई तो हडकंप मच गया। वैक्सीन पर सवाल खड़े होने पर शनिवार को भारत बायोटेक ने सफाई दी है। कंपनी ने कहा कि वालंटियर को कोवैक्सीन ट्रायल की सभी नियम और शर्तों के बारे में सारी जानकारी दी गई थी। वैक्सीन देने के अगले 7 दिनों तक उसका हालचाल भी लिया गया था।

वालंटियर की मौत पर कंपनी ने दी सफाई
दीपक मरावी की मौत का कारण कोवैक्सीन होने की बात को फार्मा कंपनी ने सिरे से खारिज किया है। को-वैक्सीन तैयार करने वाली भारत बायोटेक ने साफ तौर पर कहा कि दीपक की मौत का ट्रायल के दौरान लगाए गए वैक्सीन के टीके से कोई संबंध नहीं है। बता दें कि भोपाल के टीला जमालपुरा निवासी दीपक के स्वजनों ने मौत के पीछे को वैक्सीन को कारण बताया था। दीपक को भोपाल के एक निजी अस्पताल में वैक्सीन दी गई थी। इसके 10 दिन बाद 21 दिसंबर को उसकी मौत हो गई थी।

वहीं मृतक दीपक के बेटे आकाश मरावी ने बताया कि 12 दिसंबर को वैक्सीन लगने के बाद 19 दिसंबर को उनके पिता की तबीयत बिगड़ गई थी। उन्हें अचानक घबराहट, बेचैनी, जी मिचलाने के साथ उल्टियां होने लगीं। लेकिन उन्होंने इसे सामान्य बीमारी समझकर उसका इलाज नहीं कराया। दीपक के मुताबिक डोज लगवाने के बाद से पिता ने मजदूरी पर जाना बंद कर दिया था। वे कोरोना प्रोटोकॉल का पालन कर रहे थे। उसने बताया कि दिसंबर को जब उनका निधन हुआ, तब वे घर में अकेले थे।

भारत बायोटेक ने मृतक की मौत पर सहानुभूति जताई । हालांकि अपना पक्ष रखते हुए कहा कि हम ये दोहराना चाहेंगे कि हम अध्यन प्रोटोकॉल, गुड क्लिनिकल प्रैक्टिसेस दिशानिर्देशों के साथ-साथ सभी लागू वैधानिक प्रावधानों के अनुपालन में अपने डायग्नोस्टिक परीक्षणों का संचालन करते हैं और हम हर समय रोगी सुरक्षा पर ध्यान केंद्रित करते हैं।

वैक्सीन लगाने के समय स्वस्थ था वालंटियर
हैदराबाद स्थित कंपनी का कहना है कि एनरोलमेंट के समय वालंटियर ने फेज-3 ट्रायल के सभी मानकों को पूरा किया था। डोज देने के 7 दिन बाद तक वालंटियर की लगातार निगरानी हुई। इसमें वो पूरी तरह स्वस्थ पाया गया था। वालंटियर पर किसी तरह का कोई साइड इफेक्ट देखने को नहीं मिला था। भोपाल के गांधी मेडिकल कॉलेज की पोस्टमार्टम रिपोर्ट के मुताबिक मौत का कारण कार्डियॉरेस्पिरेट्री फेलियर हो सकता है। ये शरीर में जहर के चलते हुआ हो सकता है।

कंपनी का कहना है कि इस मामले की पुलिस जांच की जा रही है। कंपनी का कहना है कि मौत डोज देने के नौ दिनों बाद हुई है और प्रारंभिक समीक्षा के बाद वालंटियर की मौत से डोज लेने से हुई प्रतीत नहीं होती है।

कंपनी का कहना है कि हम ये भी नहीं कह सकते कि मृतक को परीक्षण की जा रही वैक्सीन दी गई थी या ‘प्लेसिबो’। कंपनी का कहना है कि ऐसे कई कारक है जो डायग्नोस्टिक परीक्षणों के दौरान प्रतिकूल घटना का कारण बन सकते हैं, जिसमें रोगी की अंतिर्निहित बीमारी, अन्य पूर्व-मौजूदा स्थितियां या दुर्घटना जैसी कोई अन्य असंबंधित चीजें शामिल हैं।

कंपनी के मुताबिक प्रारंभिक जांच से ये पता चलता है कि मौत का ट्रायल में दी गई वैक्सीन से कुछ लेना देना नहीं है। भारत बायोटेक ने ये भी कहा कि वैक्सीन का ट्रायल गुप्त तरीके से किया जाता है, इसलिए ये भी नहीं कहा जा सकता कि वालंटियर को असली वैक्सीन दी गई थी या प्लेसिबो। प्लेसिबो कोई दवा नहीं होती और इसका कोई साइड इफेक्ट भी नहीं होता। प्लेसिबो का इस्तेमाल डॉक्टर यह जानने के लिए करते हैं कि कोई दवा लेने से व्यक्ति पर मानसिक तौर पर क्या असर होता है।

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