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Hal Shashti 2021: ‘हलछठ’ व्रत आज, जानें हलषष्ठी के त्योहार शुभ मुहूर्त, महत्व और व्रत कथा

धर्म डेक्स। हिन्दू धर्म में प्रत्येक व्रत एवं त्योहार का विशेष महत्त्व है। हमारे देश में अलग -अलग त्योहार की अलग धूम देखने को मिलती है। प्रत्येक व्रत व त्योहार बड़ी ही श्रद्धा भाव से पूरे रीति रिवाज के आठ मनाया जाता है। ऐसे ही व्रत त्योहारों में से एक है हल षष्ठी का त्योहार। यह त्योहार श्री कृष्ण के बड़े भाई बलराम जी के जन्मदिवस के रूप में पूरे देश में धूमधाम से मनाया जाता है। पारंपरिक हिंदू पंचांग में हल षष्ठी एक महत्वपूर्ण त्योहार है। यह भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम जी को समर्पित है। भगवान बलराम माता देवकी और वासुदेव जी की सातवें संतान थे।

हर साल भाद्रपद के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को बलराम जयंती मनाई जाती है। श्रावण पूर्णिमा के छह दिन बाद हलषष्ठी मनाई जाती है। इसे अलग जगहों पर अलग -अलग नामों से जाना जाता है। कुछ जगह इसे हल छठ तो कुछ जगह हल षष्ठी नाम से जाना जाता है। इस दिन का भी शास्त्रों में विशेष महत्व बताया गया है और इस व्रत को मुख्य रूप से संतान की सुख समृद्धि के लिए रखा जाता है।

हल षष्ठी तिथि और शुभ मुहूर्त

हलषष्ठी का त्योहार श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम जी को समर्पित है। भगवान बलराम माता देवकी और वासुदेव जी की सातवें संतान थे। श्रावण पूर्णिमा के छह दिन बाद हल षष्ठी मनाई जाती है।

  • इस साल हल षष्ठी की तिथि- 28 अगस्त 2021, शनिवार
  • षष्ठी तिथि प्रारंभ – 27 अगस्त, 2021 को शाम 06:48 बजे
  • षष्ठी तिथि समाप्त – 28 अगस्त, 2021 को प्रातः 08:56 बजे

उदया तिथि में षष्ठी तिथि 28 अगस्त की है इसलिए इसी दिन व्रत रखना फलदायी होगा।

हल षष्ठी व्रत की मान्यता

आरती दहिया जी बताती हैं कि इस व्रत की मान्यता यह है कि इस दिन बिना हल चली धरती से पैदा होने वाले अन्न का सेवन करना चाहिए। इस दिन गाय के दूध व दही का सेवन भूलकर भी नहीं करना चाहिए। बलराम जी का मुख्य शस्त्र हल और मूसल होने के कारण इन्हें हलधर भी कहा जाता है और उन्हीं के नाम पर इस पर्व को हलषष्ठी कहते है।

हलषष्ठी व्रत का महत्व

मुख्य रूप से हल षष्ठी का व्रत संतान सुख के लिए किया जाता है। इस व्रत को करने से संतान की दीर्घायु होने की कामना पूरी होती है, जो माताएं इस व्रत को नियम पूर्वक करती हैं उनकी संतान को कोई बाधा नहीं आ पाती है। संतान की इच्छा रखने वाली माताओं के लिए भी ये व्रत विशेष रूप से फलदायी होता है।

हलषष्ठी व्रत पूजन विधि

इस दिन प्रातःकाल स्नानादि से निवृत्त होने के पश्चात् पृथ्वी को लीपकर एक छोटा सा तालाब बनाया जाता है जिसमें झरबेरी, पलाश, गूलर की एक-एक शाखा बांधकर गाड़ दी जाती है और इसकी पूजा की जाती है। पूजन में सात अनाज जिसमें मुख्यतः गेहूं, चना, धान, मक्का, ज्वार, बाजरा, जौ आदि को भून कर चढ़ाया जाता है। इसके उपरान्त एक हल्दी से रंगा हुआ वस्त्र और समस्त सुहाग सामग्री भी चढ़ाई जाती है। इस व्रत पर रात्रि जागरण का विशेष महत्व है माना जाता है। यह भी मान्यता है कि इस दिन जिस व्यक्ति ने व्रत नियम लिया होता है वह पूर्ण रात्रि जाग कर प्रभु सिमरन करता है तभी इस व्रत का फल प्राप्त होता है। इस दिन जो माताएं व्रत का पालन करती हैं उन्हें किसी भी ऐसी खाद्य सामग्री का सेवन नहीं करना चाहिए जो हल चली हुई जमीन पर उगाई गई हो। तालाब में उगे हुए फलों और सब्जियों का सेवन करते हुए व्रत को करना फलदायी है। इस दिन गाय के दूध का सेवन किसी भी रूप में नहीं करना चाहिए।

इस तरह करें हलषष्ठी की पूजा 

  • इस दिन सूर्योदय से पहले उठना चाहिए। नित्यकर्मों से निवृत्त होकर स्नान कर साफ कपड़े पहनें।
  • जहां पूजा करनी है उस जगह को अच्छे से साफ करें। पूजन स्थल पर गंगाजल छिड़कें।
  • पूजन स्थल पर श्रीकृष्ण और बलराम जी की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें। इन्हें फूलों का हाल चढ़ाएं।
  • अगर हो सके को एक छोटा हल भी पूजन स्थल पर रखें क्योंकि बलराम का शस्त्र उनका हल है।
  • बलराम जी को नीले और श्री कृष्ण को पीले वस्त्र अर्पित करें।
  • प्रतिमा के आगे दीप जलाएं।
  • श्री कृष्ण-बलराम जी का स्तुति पाठ करें।
  • सच्चे मन से बलराम जी से प्रार्थना करें कि आपकी संतान बलशाली हो।

हलषष्ठी पर पढ़ें पौराणिक एवं प्रामाणिक व्रत कथा

भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की षष्ठी को यह पर्व भगवान श्रीकृष्ण के ज्येष्ठ भ्राता श्री बलरामजी के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। इसी दिन श्री बलरामजी का जन्म हुआ था। हल षष्ठी की व्रतकथा निम्नानुसार है….
प्राचीन काल में एक ग्वालिन थी। उसका प्रसवकाल अत्यंत निकट था। एक ओर वह प्रसव से व्याकुल थी तो दूसरी ओर उसका मन गौ-रस (दूध-दही) बेचने में लगा हुआ था। उसने सोचा कि यदि प्रसव हो गया तो गौ-रस यूं ही पड़ा रह जाएगा। यह सोचकर उसने दूध-दही के घड़े सिर पर रखे और बेचने के लिए चल दी किन्तु कुछ दूर पहुंचने पर उसे असहनीय प्रसव पीड़ा हुई। वह एक झरबेरी की ओट में चली गई और वहां एक बच्चे को जन्म दिया।
वह बच्चे को वहीं छोड़कर पास के गांवों में दूध-दही बेचने चली गई। संयोग से उस दिन हल षष्ठी थी। गाय-भैंस के मिश्रित दूध को केवल भैंस का दूध बताकर उसने सीधे-सादे गांव वालों में बेच दिया। उधर जिस झरबेरी के नीचे उसने बच्चे को छोड़ा था, उसके समीप ही खेत में एक किसान हल जोत रहा था। अचानक उसके बैल भड़क उठे और हल का फल शरीर में घुसने से वह बालक मर गया।
इस घटना से किसान बहुत दुखी हुआ, फिर भी उसने हिम्मत और धैर्य से काम लिया। उसने झरबेरी के कांटों से ही बच्चे के चिरे हुए पेट में टांके लगाए और उसे वहीं छोड़कर चला गया। कुछ देर बाद ग्वालिन दूध बेचकर वहां आ पहुंची। बच्चे की ऐसी दशा देखकर उसे समझते देर नहीं लगी कि यह सब उसके पाप की सजा है।
वह सोचने लगी कि यदि मैंने झूठ बोलकर गाय का दूध न बेचा होता और गांव की स्त्रियों का धर्म भ्रष्ट न किया होता तो मेरे बच्चे की यह दशा न होती। अतः मुझे लौटकर सब बातें गांव वालों को बताकर प्रायश्चित करना चाहिए। ऐसा निश्चय कर वह उस गांव में पहुंची, जहां उसने दूध-दही बेचा था। वह गली-गली घूमकर अपनी करतूत और उसके फलस्वरूप मिले दंड का बखान करने लगी। तब स्त्रियों ने स्वधर्म रक्षार्थ और उस पर रहम खाकर उसे क्षमा कर दिया और आशीर्वाद दिया।
बहुत-सी स्त्रियों द्वारा आशीर्वाद लेकर जब वह पुनः झरबेरी के नीचे पहुंची तो यह देखकर आश्चर्यचकित रह गई कि वहां उसका पुत्र जीवित अवस्था में पड़ा है। तभी उसने स्वार्थ के लिए झूठ बोलने को ब्रह्म हत्या के समान समझा और कभी झूठ न बोलने का प्रण कर लिया।

अंत में निम्न मंत्र से प्रार्थना करें-

गंगाद्वारे कुशावर्ते विल्वके नीलेपर्वते।
स्नात्वा कनखले देवि हरं लब्धवती पतिम्‌॥
ललिते सुभगे देवि-सुखसौभाग्य दायिनि।
अनन्तं देहि सौभाग्यं मह्यं, तुभ्यं नमो नमः॥

– अर्थात् हे देवी! आपने गंगा द्वार, कुशावर्त, विल्वक, नील पर्वत और कनखल तीर्थ में स्नान करके भगवान शंकर को पति के रूप में प्राप्त किया है। सुख और सौभाग्य देने वाली ललिता देवी आपको बारम्बार नमस्कार है, आप मुझे अचल सुहाग दीजिए।

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