भारत के फेफड़े पर चल रही कुल्हाड़ी, खतरे में है बस्तर का हरा दिल अबूझमाड़

रायपुर ।

को बस्तर को वामपंथी उग्रवाद मुक्त घोषित किए जाने के बाद से, विशेषकर छत्तीसगढ़ के अबूझमाड़ क्षेत्र के नारायणपुर जिले में सड़क निर्माण, वन भूमि को कृषि भूमि में परिवर्तित करने, पेंदा अर्थात झूम खेती (कुछ आदिवासी समुदायों द्वारा परंपरागत रूप से अपनाई जाने वाली स्थानांतरित अथवा शिफ्टिंग खेती की पद्धति), के नाम पर ऐसे व्यक्तियों द्वारा वन क्षेत्र साफ कर पेड़ों को जलाने जो इस पारंपरिक प्रथा के वास्तविक पात्र नहीं हैं, तथा इमारती लकड़ी की तस्करी के उद्देश्य से बड़े पैमाने पर वृक्षों की कटाई की गतिविधियों में तेजी आने संबंधी लगातार सूचनाएँ एवं प्रमाण प्राप्त हो रहे हैं। आधुनिक जेसीबी, डोजर एवं अन्य भारी मशीनों से प्राकृतिक वनों को तेजी से साफ किया जा रहा है। विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार प्रतिदिन लगभग 50 से 70 हेक्टेयर (0.50 से 0.70 वर्ग किलोमीटर) वन क्षेत्र विभिन्न कारणों से नष्ट किया जा रहा है। इन गतिविधियों पर तत्काल हस्तक्षेप की मांग करते हुए रायपुर निवासी नितिन सिंघवी ने मुख्य सचिव को पत्र लिखा है।

लगभग 5000–6000 वर्ग किलोमीटर में फैला अबूझमाड़ मध्य भारत के सबसे बड़े सतत वन क्षेत्रों में से एक है और पूरे भारत के भी सबसे बड़े शेष बचे प्राकृतिक वन क्षेत्रों में इसकी गिनती होती है। यह विशाल वन क्षेत्र बड़ी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित कर जलवायु संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसी कारण अबूझमाड़ भारत के फेफड़ों के समान एक अमूल्य प्राकृतिक धरोहर है। साथ ही यह छत्तीसगढ़ के राजकीय पशु जंगली भैंसा, बाघ, तेंदुआ, भालू तथा अनेक अन्य दुर्लभ वन्यजीवों का महत्वपूर्ण प्राकृतिक आवास है।पूरा इलाका डीम्ड फॉरेस्ट है

सिंघवी ने कहा कि अबूझमाड़ का आज तक विधिवत भूमि सर्वेक्षण नहीं हुआ है। इसी कारण यहाँ यह अभिलेख उपलब्ध नहीं हैं कि कौन-सी भूमि राजस्व विभाग की है और कौन-सी वन विभाग की। वर्तमान में भूमि सर्वेक्षण किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय के टी.एन. गोदावर्मन प्रकरण में प्रतिपादित सिद्धांतों के अनुसार प्राकृतिक रूप से वन क्षेत्र प्रथम दृष्टया डीम्ड फॉरेस्ट की श्रेणी में आते हैं। इसी आधार पर अबूझमाड़ का विशाल प्राकृतिक वन क्षेत्र भी प्रथम दृष्टया डीम्ड फॉरेस्ट है। इसके बावजूद अनेक स्थानों पर भूमि सर्वेक्षण पूरा होने से पहले ही सड़क निर्माण एवं अन्य अधोसंरचना कार्यों के लिए बड़ी संख्या में परिपक्व वृक्षों की कटाई की जा रही है। उन्होंने कहा कि विकास का विरोध नहीं है, परंतु भूमि सर्वेक्षण पूरा होने तथा भूमि की विधिक स्थिति स्पष्ट होने से पहले इस प्रकार की गतिविधियाँ भविष्य में गंभीर पर्यावरणीय संकट एवं कानूनी विवाद उत्पन्न कर सकती हैं। उस समय तक परिपक्व प्राकृतिक वनों का जो नुकसान हो चुका होगा, उसकी भरपाई किसी भी प्रकार संभव नहीं होगी।वन अधिकार अधिनियम को लेकर फैली अफवाह

सिंघवी ने बताया कि उन्हें मिली जानकारी के अनुसार स्थानीय लोगों के बीच यह अफवाह फैलाई जा रही है कि यदि 31 मार्च 2026 से एक वर्ष के भीतर जंगल काटकर उस पर कब्जा कर खेती प्रारंभ कर दी जाए तो वन अधिकार अधिनियम, 2006 के अंतर्गत उस भूमि का पट्टा मिल जाएगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि अधिनियम के अनुसार अनुसूचित जनजातियों के लिए 13 दिसंबर 2005 या उससे पूर्व का कब्जा तथा अन्य परंपरागत वन निवासियों के लिए उससे पूर्व लगातार तीन पीढ़ियों (75 वर्ष) का निवास एवं वन पर निर्भरता सिद्ध करना अनिवार्य है। आधुनिक सैटेलाइट एवं रिमोट सेंसिंग तकनीक के युग में यह आसानी से सत्यापित किया जा सकता है कि किसी भूमि पर वास्तविक कब्जा कब से है। इसलिए आज जंगल काटकर नया कब्जा करने से किसी भी व्यक्ति को वन अधिकार अधिनियम के अंतर्गत कोई अधिकार प्राप्त नहीं हो सकता। उन्होंने आशंका व्यक्त की कि इसी अफवाह के कारण बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई की जा रही है।क्या कह रहे हैं अधिकारी?

सिंघवी ने अपने पत्र में यह भी उल्लेख किया है कि एक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी ने स्वीकार किया है कि यदि एक भी मामले में कार्रवाई की जाए तो ऐसे सैकड़ों अथवा हजारों मामलों में कार्रवाई करनी पड़ेगी, जिससे व्यापक असंतोष उत्पन्न हो सकता है तथा भूमि सर्वेक्षण भी प्रभावित हो सकता है। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि वन विभाग के एक अधिकारी ने स्वीकार किया है कि इन क्षेत्रों में रेंजर, डिप्टी रेंजर एवं वनरक्षक तक पदस्थ नहीं हैं, जिसका कुछ लोग अनुचित लाभ उठा रहे हैं।अबूझमाड़ बचाने के लिए दिए सुझाव

1. अबूझमाड़ के अनसर्वेक्षित क्षेत्रों में भूमि सर्वेक्षण पूर्ण होने तक वृक्षों की कटाई वाले सड़क एवं अन्य अधोसंरचना कार्यों पर तत्काल रोक लगाने के लिए आवश्यक निर्देश जारी किए जाएँ।
2. वन अधिकार अधिनियम, 2006 के संबंध में फैली भ्रांतियों को दूर करने के लिए स्थानीय भाषाओं में व्यापक जनजागरूकता अभियान चलाकर स्पष्ट किया जाए कि 13 दिसंबर 2005 के बाद किए गए किसी भी नए कब्जे पर वन अधिकार अधिनियम के अंतर्गत कोई अधिकार प्राप्त नहीं हो सकता।
3. वन कटाई, अवैध लकड़ी तस्करी तथा नए अतिक्रमणों को रोकने के लिए वर्तमान में उपलब्ध डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड (DRG) के बल की प्रभावी सहायता ली जाए।

चर्चा में सिंघवी ने कहा कि अबूझमाड़ केवल छत्तीसगढ़ की ही नहीं, बल्कि पूरे भारत की प्राकृतिक धरोहर है। यदि आज इस वन संपदा को बचाने के लिए प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें कभी माफ़ नहीं करेंगी। राज्य शासन को ऐसी स्थिति कभी उत्पन्न नहीं होने देनी चाहिए कि राज्य की जनता यह सोचने को मजबूर हो जाए कि जब अबूझमाड़ अशांत था तब उसके जंगल अपेक्षाकृत अधिक सुरक्षित थे और अब, जब क्षेत्र में शांति स्थापित हो रही है, वही जंगल तेजी से समाप्त हो रहे हैं।
नितिन सिंघवी

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